आजकल मैं खुद से ही लड़ रहा हु ...
क्या सॊच रहा हु ...और न जाने क्या कर रहा हु ..
सब का अच्छा रहू या खुद से सच्चा रहू ...
या जैसा हु वैसा ही रहु ...
इस अच्छाई और सच्चाई में
खुद को खो रहा हु ...खो रहा हु ...
आजकल मैं खुद से ही लड़ रहा हु ...
क्या सॊच रहा हु ...और न जाने क्या कर रहा हु ..
आजकल मैं खुद से ही लड़ रहा हु ...
क्या सॊच रहा हु ...और न जाने क्या कर रहा हु ..
क्या सॊच रहा हु ...और न जाने क्या कर रहा हु ..
चल रहा हु ...बस चल रहा हु ...
सवाल ही सवाल है ...
सवालों में ही जवाब है ...
जवाब भी कुछ लाजवाब है ...
बस इस सवाल जवाब की पहेली में खोद को झोक के ...
सब का अच्छा रहू या खुद से सच्चा रहू ...
या जैसा हु वैसा ही रहु ...
इस अच्छाई और सच्चाई में
खुद को खो रहा हु ...खो रहा हु ...
क्या मेरा है और मैं किसका हु ...
वो मेरा है या मैं उसका हु ...
कौन किसका है और किसका कौन है ...
ऐसे सवालो में खोद को खो रहा हु ...
आजकल मैं खुद से ही लड़ रहा हु ...
क्या सॊच रहा हु ...और न जाने क्या कर रहा हु ..
चल रहा हु ...बस चल रहा हु ...
परिस्थितियों के पेच में ...
खुस को उलझा और असहाय पा रहा हु ...
इन सवालों एक दलदल में बस खुद को डूबता पा रहा हु ...
इस दलदल से खुद को कैसे निकालु
यह एक नया सवाल फिर में अपने साथ ले आता हु ...
आजकल मैं खुद से ही लड़ रहा हु ...
क्या सॊच रहा हु ...और न जाने क्या कर रहा हु ..
चल रहा हु ...बस चल रहा हु ...

